अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने मनाई साहित्यकार पं पदम सिंह शर्मा की जयंती
हरिद्वार 25 फरवरी अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, हरिद्वार द्वारा ओमविहार स्थित ‘श्री हरिसदनम्’ में एक विचार-गोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमें द्विवेदी युगीन साहित्यकार, सुप्रसिद्ध समालोचक तथा सम्पादकाचार्य पं. पद्मसिंह शर्मा की 150वीं जन्मजयन्ती पर उन्हें याद कर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व पर साहित्यकारों द्वारा प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम का प्रारम्भ माँ सरस्वती एवं पं. पद्मसिंह शर्मा जी के चित्र के समक्ष पुष्पांजली द्वारा हुआ। सरस्वती वंदना एवं गायत्री मन्त्र का उच्चारण शिविजय त्यागी ने मुख्य रूप से तथा समस्त सभा के सदस्यों ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी साहित्यकार एवं कवि डॉ.सुशील कुमार त्यागी ‘अमित’ ने कहा कि पं. पद्मसिंह शर्मा का जन्म ग्राम नायक नंगला, तहसील चाँदपुर जनपद बिजनौर (उ.प्र.) में 25 फरवरी सन् 1876 को त्यागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे संस्कृत भाषा के विशिष्ट विद्वान् तो थे ही, उर्दू, फारसी, बंगला और मराठी भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी तथा गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर में काफी समय तक अध्यापन, लेखन तथा सम्पादन का कार्य किया था। सन् 1904 ई. में स्वामी श्रद्धानन्द जी के नेतृत्व में पं. रुद्रदत्त शर्मा के सम्पादकत्व में गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार से ‘सत्यवादी’ पत्र का पं. पद्मसिंह शर्मा ने सहसम्पादन का कार्य किया था तथा सन् 1909 ई. में महाविद्यालय ज्वालापुर के मुख पत्र ‘भारतोदय’ का भी सम्पादन एवं प्रकाशन किया था। वे कुशल लेखक सम्पादक एवं हिन्दी साहित्य के समालोचक थे।
साहित्य परिषद् हरिद्वार के अध्यक्ष श्री सचिन प्रधान ने सामाजिक दायित्त्वों के निर्वहन हेतु शहर से बाहर रहते हुए दूरभाष के माध्यम से अपने श्रद्धासुमन प्रेषित करते हुए कहा कि ऐसे महान् साहित्यकार आज पूरे समाज के लिए दिशा प्रदान कर रहे हैं। जिसके कारण से साहित्य समाज सम्मृद्धि को प्राप्त हो रहा है। पं. पद्मसिंह शर्मा जी का जीवन सभी के लिए अनुकरणीय है।
इसी क्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् हरिद्वार के महामन्त्री एवं संस्कृत-हिन्दी कवि डॉ. विजय कुमार त्यागी ने कहा कि ‘बिहारी की सतसई की भूमिका’ और ‘बिहारी सतसई संजीवन भाष्य’ पं. पद्मसिंह शर्मा जी की प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। संजीवन भाष्य पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान कर उनका सम्मान किया था। शर्मा जी के कुछ निबन्ध पद्मपराग, नामक संग्रह में संकलित हैं। उनकी हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी नामक कृति से भाषा समस्या पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। डॉ. त्यागी ने पण्डित जी के जीवन पर आधारित एक स्वरचित गीत भी प्रस्तुत किया।
विचार गोष्ठी में योगसूत्रयोग@होम के संस्थापक श्री पवन उपाध्याय जी ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि पं. पद्मसिंह शर्मा से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचन्द, महाकवि नाथुराम शर्मा शंकर जैसे महान् साहित्यकार भी प्रभावित रहे। साहित्य परिषद् हरिद्वार इकाई का यह महत्त्वपूर्ण कार्य अविस्मरणीय एवं सराहनीय है कि ऐसी महान् विभूतियों के विषय में समाज में प्रचार प्रसार कर समाज को साहित्य सृजन की दिशा प्रदान की।
डॉ. अशोक गिरी ने कहा कि पं. पद्मसिंह शर्मा गद्य लेखकों और समालोचकों में विशेष स्थान रखते हैं। वे एक कुशल संस्मरणलेखक भी थे। कवयित्री डॉ.मीरा भारद्वाज ने कहा कि पं. पद्मसिंह शर्मा ने न जाने कितने नये लेखकों, कवियों को हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ाया था। इस अवसर पर अनीता, दीपशिखा, प्राची, शिविजय आदि ने भी पं. पद्मसिंह शर्मा का पुण्य स्मरण कर श्रद्धांजलि समर्पित की।
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